दिवाली | दीपावली | Diwali in Hindi

Dheeraj Pandit

दिवाली | दीपावली | दिवाली या दीपावली पर निबन्ध | दीप दानोत्सव | Diwali in Hindi |  Deepawali in Hindi | Essay on Diwali or Deepawali |Deep Danotsav

भारत विविधताओं से भरा हुआ देश है। यहाँ बहुत सारी संस्कृतियां और सभ्यताएं हैं। यहाँ बहुत से धर्म है। यहाँ विभिन्न धर्मो से सम्बन्धित बहुत सारे त्योहार है। यहाँ के प्रमुख त्योहारों में दिवाली का भी एक त्योहार है। दिवाली सभी धर्म के लोगों द्वारा  बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाती है। इस धर्म को मनाने के पीछे अनेक अवधारणाएं हैं।

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दिवाली | दीपावली | दिवाली या दीपावली पर निबन्ध | दीप दानोत्सव | Diwali in Hindi |  Deepawali in Hindi | Essay on Diwali or Deepawali |Deep Danotsavइस साल दिवाली कब हैदिवाली को लोग क्यो मनाते है?दिवाली मनाने के पीछे की अवधारणाएंभगवान राम की रावण पर विजयमाता लक्ष्मी, कुबेर तथा धनवंतरि की उत्पत्तिभगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को बचाया थाहिरण्यकश्यप  का वधश्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वधमहाकाली का रूपपांडव की अपने राज्य में वापसीजैन धर्म का मोक्ष दिवसबौध्द धर्म का दीप दान उत्सवसम्राट अशोक का बौध्द धर्म  को ग्रहण करनासिख धर्म में दिवाली का महत्वदिवाली मनाने के कारणों का विश्लेषणदीवाली का रामकथा से कोई सम्बन्ध नही हैदीवाली मनाने का वास्तविक कारणखरीफ की फसल का पकनागौतम बुध्द का ज्ञान प्राप्त करके अपने घर आनासम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद ह्रदय परिवर्तित होनादिवाली मनाने के तरीके

दिवाली को दीपावली भी कहा जाता है। यह रोशनी का त्योहार है। यह कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। रूढ़िवादी मान्यताओ के अनुसार इसमे माँ लक्षमी की पूजा की जाती है। यह त्योहार सत्य की असत्य पर, प्रकाश की अन्धकार पर तथा अहिंसा की हिंसा पर विजय को दर्शाता है। इसकी बहुत पहले से  ही तैयारी शुरू हो जाती है। लोग घरों की सफाई करते है, कूड़ा-कचरा बहार निकालते है तथा रंग रोगन करवाते है।

दिवाली को दीप दानोत्सव भी कहा जाता है। दीप जलाना सम्यक श्रमण परम्परा है। ज्ञान प्राप्त करने के बाद जब  बुध्द अपने घर वापस आये तो नगरवासियों ने दिये जलाकर उनके घर आने की खुशी मनाई। इस दिन बुध्द की माता की पूजा की जाती है।

इस साल दिवाली कब है

यह इस साल 31 अक्टुबर  2024 को गुरूवार के दिन मनाई जायेगी।

त्योहारतारीखदिन
धनतेरस 29 अक्टुबर 2024मंगलवार
छोटी दीवाली ( नरक चतुर्दशी )30 अक्टुबर 2024बुधवार
दीवाली31 अक्टुबर 2024गुरूवार
गोवर्धन पूजा2 अक्टुबर 2024शनिवार
भाईदूज3 अक्टुबर 2024रविवार

 

दिवाली को लोग क्यो मनाते है?

यह हिन्दुओं का प्रमुख त्योहार है। इसे दीपोत्सव भी कहते है। इसका सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से विशेष महत्व है।  इसमे मुख्यत: लक्ष्मी की पूजा की जाती है। लोगों का विश्वास है कि लक्ष्मी की पूजा करने से सुख समृध्दि मिलती है और घर धन- धान्य से भर जाता है। बौध्द, जैन तथा सिख धर्म में भी इसे मनाया जाता है। बौध्द धर्म  में इसे दीप दानोत्सव के रूप में मनाया जाता है। जैन धर्म में इसे महावीर स्वामी के मोक्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है।  सिख धर्म में इसे बन्दी छोड दिवस ( Red Light Day) के  रूप में मनाया जाता है।

दिवाली मनाने के पीछे की अवधारणाएं

इसे मनाने के पीछे अनेक अवधारणाएं है।

भगवान राम की रावण पर विजय

भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास हुआ था।  वनवास के दौरान उनका माता सीता को लेकर रावण के साथ युध्द हुआ। इस युध्द में राम की विजय हुई। ऐसी अवधारणा है कि जब राम 14 वर्ष का वनवास खत्म करके अयोध्या पहुँचे तो वहाँ की जनता अपने प्रिय राजा के आगमन की खुशी में पागल हो गयी। अयोध्या की जनता ने उनके इस आगमन पर घी के दीपक जलायें । कार्तिक महिने की वह काली अमावस्य दीपों की रोशनी से जगमगा उठी। तभी से यह त्योहार प्रतिवर्ष भारतीयों के द्वारा हर्ष व उल्लास के साथ के साथ मनाया जाता है।

माता लक्ष्मी, कुबेर तथा धनवंतरि की उत्पत्ति

माँ लक्ष्मी  धन की देवी है। हिन्दु धर्म ग्रन्थों के अनुसार इसी दिन समुंद्र मंथन के दौरान माँ लक्ष्मी कुबेर तथा धनवंतरि की उत्पत्ति हुई थी। इसीलिए इस दिन माँ लक्ष्मी का जन्म मनाया जाता है तथा उनकी पूजा का जाती है।

भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी को बचाया था

हिन्दु धर्म ग्रन्थों के अनुसार माँ लक्ष्मी को राजा बाली ने कैद कर लिया था। इसी दिन  भगवान विष्णु ने वामन अवतार  धारण करके माँ लक्ष्मी को राजा बाली के चंगुल से बचाया था। तभी से प्रतिवर्ष माँ लक्ष्मी की पूजा करके दीपावली का पर्व श्रध्दाभाव के साथ के मनाया जाता है।

हिरण्यकश्यप  का वध

इसी दिन भगवान विष्णु ने नरसिंह का रूप धारण करके हिरण्यकश्यप का वध किया था। इसकी खुशी मे प्रजा ने घी के दिये जलाकर दीवाली मनायी।

श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध

राजा नरकासुर ने तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। वह देवी-देवताओं को परेशान कर रहा था। श्रीकृष्ण ने गोकुल में  अमावस्य से एक दिन पहले चतुर्दशी के दिन नरकासुर का वध किया।  इससे खुश होकर गोकुलवासियों ने अगले दिन दीप जलाकर अमावस्य की रात को रोशन कर दिया। तभी से यह त्योहार प्रतिवर्ष हर्ष व उल्लास के साथ के साथ मनाया जाता है।

महाकाली का रूप

जब राक्षसों का अत्याचार बहुत बढ़ गया, तब महाशक्ति ने महाकाली का रूप धारण किया। राक्षसों को मारने के बाद भी जब महाकाली का गुस्सा शान्त नही हुआ, तब भगवान शिव  महाकाली के पैरों में लेट गये। भगवान शिव  के स्पर्श मात्र से ही महाकाली का रौद्र रूप शान्त हो गया । इस दिन महाकाली के इसी शान्त रूप की पूजा की जाती है। रात में महाकाली का रौद्र रूप की भी पूजा की जाती है।

पांडव की अपने राज्य में वापसी

12 वर्ष का वनवास खत्म करके  पांडव अपने राज्य में वापस पहुँचे।  इसी दिन उनके इस आगमन पर वहाँ की जनता ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया।

इसी दिन महर्षि दयानंद सरस्वती को निर्वाण प्राप्त हुआ था। इसी दिन सम्राट विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ था। इसी दिन नेपाल संवत में नया वर्ष आरंभ होता है।

जैन धर्म का मोक्ष दिवस

भगवान महावीर स्वामी जैन धर्म के 24 वें तीर्थकर थे। इसी दिन उन्हें निर्वाण की प्राप्ति हुई। जैन धर्म मे इस दिन को मोक्ष दिवस के रूप में मनाया जाता है।

बौध्द धर्म का दीप दान उत्सव

सिध्दार्थ गौतम ने 29 वर्ष की आयु में घर छोड़ दिया था।  33 वर्ष की आयु में उन्हे ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति के बाद सिध्दार्थ गौतम बुध्द कहलाये। ज्ञान प्राप्ति के बाद के जब गौतम बुध्द कपिलवस्तु आए, तो वहाँ की जनता ने उनके आने की खुशी में दीपक जलाए। जिससे पूरी कपिलवस्तु कार्तिक महिने की अमावस्या की रात में जगमगा उठी। तभी से यह बौध्दिस्टों का प्रमुख त्योहार बन गया। तभी से यह त्योहार बौध्दिस्टों द्वारा  प्रतिवर्ष हर्षोल्लास तथा धुमधाम के साथ के साथ मनाया जाता है।

सम्राट अशोक का बौध्द धर्म  को ग्रहण करना

जब सम्राट अशोक ने कलिंग नगर पर आक्रमण किया था , तो वहाँ खून खराबे को देखकर उसका ह्रदय परिवर्तित हो गया। दिवाली के दिन सम्राट अशोक ने बौध्द धर्म स्वीकार किया। इस दिन को अहिंसा की हिंसा के ऊपर विजय के रूप के मनाया जाता है।

सिख धर्म में दिवाली का महत्व

1577 में इसी दिन सिखों के तीसरे गुरु अमर दास ने स्वर्ण मंदिर की नींव रखी थी। 1609 में इसी दिन सिखों के छठे गुरु हरगोविंद को  मुगल शासक जहांगीर ने ग्वालियर के किले की कारागार से रिहा किया था।

दिवाली मनाने के कारणों का विश्लेषण

दीवाली का रामकथा से कोई सम्बन्ध नही है

किसी भी आधिकारिक ग्रन्थ में दीवाली का राम से सम्बन्ध होने का कोई प्रमाण नही मिलता। पंडित श्रवणलाल ‘भारत धर्म महामंडल’ वाराणसी के महापहोपदेशक है। उन्होंने अपनी पुस्तक व्रतोत्सव चन्द्रिका में दीवाली का वर्णन (पृष्ट 161 से 169) किया है। इस वर्णन में दीवाली के संदर्भ में राम का नाम एक बार भी नही आया है। वाराणसी से ही प्रकाशित एक अन्य पुस्तक व्रतोत्सव कौमुदी में भी दीवाली का वर्णन ( पृष्ट 58 से 60) किया है। इसमे भी दीवाली के संदर्भ में राम का नाम नही मिलता।

मत्स्यपुराण, आदित्यपुराण, ब्रह्मापुराण, सनत्संहिता, भविष्योत्तरपुराण, निर्णयपुराण, कृत्यरत्नावली, वीरमित्रोदय तथा मध्ययुगीन ग्रन्थों में जहाँ कही भी दीवाली का वर्णन मिलता है वहाँ राम का दीवाली से सम्बन्ध होने का कोई प्रमाण नही मिलता। बाल्मीकि रामायण में लिखा है कि राम ने  रावण का वध  चैत्र महिने (फरवरी, मार्च) की  कृष्ण पक्ष अमावस्या को किया था।

इसलिए कार्तिक महिने में राम के अयोध्य पहुंचने की बात सरासर गलत है। अतः दीवाली के साथ राम को जोड़ना एक बहुत बडी भुल है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि दीवाली का राम से सम्बन्ध होने की बात सरासर गलत है।

दीवाली मनाने का वास्तविक कारण

इसे मनाने के कुछ ही वास्तविक कारण है जोकि प्रमाणिक है। यें कारण निम्न है-

खरीफ की फसल का पकना

कार्तिक महिने यानि अक्टूबर तक खरीफ की फसल पककर तैयार हो जाती है। नया अन्न लोगों के घरों में आता है। अन्न आने से पहले ही लोग अपने-अपने घरों को साफ-सुथरा तथा रंग करके  सजा लेते है। घरों में जब अन्न आता है तो खुशी मनाते है। अतः यह किसानों का पर्व है।

गौतम बुध्द का ज्ञान प्राप्त करके अपने घर आना

बुध्द के समय में प्रायः पानी को लेकर झगड़े होते रहते थे। इन झगड़ों में कभी-कभी हत्याएं भी हो जाती थी। ऐसा ही झगड़ा उनके शाक्य गणराज्य का कोलिय राज्य के साथ हुआ था। गौतम ने अपने कबिले के लोगों से वायदा किया कि वह इस मामले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लेंगे और यदि इसे सुलझा नहीं पाते तो स्वेच्छा से वनवास ग्रहण कर लेंगे।

जब इस मामले पर शाक्य गणराज्य के राजाओं की सभा हुई और मतदान हुआ। गौतम के पक्ष में कम मत पड़े और वें हार गए। वें अपने मत से सभा में बैठे राजाओं को संतुष्ट नहीं कर पाए। इसलिए वें वनवास चले गये। वनवास के दौरान वें सत्य की खोज में लगे रहे। अनंतः  सत्य की खोज कर ली। ज्ञान प्राप्त करने के बाद वें बुद्ध कहलाए। 6-7 वर्षों के बाद जब वें अपने घर पहुंचे तब उनके राज्य की जनता ने दिए जलाकर उनका स्वागत किया। तभी से यह त्यौहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है।

सम्राट अशोक के कलिंग युद्ध के बाद ह्रदय परिवर्तित होना

कलिंग युद्ध के बाद युद्ध के भयानक दृश्य को देखकर वें बहुत दुखी हुए। वें बुद्ध की शरण में आ गए। उन्होंने 84000 बौद्ध स्तूप बनवाए। कार्तिक महीने की अमावस्या की रात में सभी घरों तथा स्तूपों के ऊपर दिए जलाए गए। तभी से यह पर्व दिवाली हर साल मनाया जा रहा है।

दिवाली मनाने के तरीके

इस दिन सभी लोग अपने घरों में अच्छे-अच्छे पकवान और मिठाइयां बनाते हैं। परिवार के सभी व्यक्ति और बच्चे नए नए कपड़े पहनते हैं। सभी लोग अपने मित्रों व रिश्तेदारों में गिफ्ट व मिठाइयां भेंट करते हैं। बच्चे पटाखे पटकाते है तथा फूलझड़ी जलाते हैं। रात में सब लोग अपने घरों के बाहर मोमबत्ती व दिए जलाते हैं। कुछ लोग अपने घरों के बाहर रंगोली भी बनाते हैं, जिसमें वे अलग-अलग रंगों का प्रयोग करते है।

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