रमाबाई अंबेडकर की जीवनी | Ramabai Ambedkar Jivani in hindi | रमाबाई | Ramabai in hindi | माता रमाबाई अंबेडकर का जीवन परिचय | माता रमाबाई अंबेडकर का जन्म कहाँ और कब हुआ था | माता रमाबाई अंबेडकर का मृत्यु कहाँ और कब हुई थी | माता रमाबाई अंबेडकर की इतिहास
कहा जाता है कि एक पुरुष की सफलता के पीछे किसी महिला का हाथ होता है। ऐसे ही डॉ. भीमराव आंबेडकर की सफलता के पीछे Mata Ramabai आंबेडकर का हाथ है। रमाबाई अंबेडकर एक नेक, सुशील, सदाचारी, कर्त्तव्यपरायण तथा हर परिस्थिति में पति का साथ देने वाली एक महिला थी। जितने भी महापुरुष हुए है उन सभी की पत्नि नेक और कर्त्तव्यपरायण थी। समाज के दलित तथा शोषित लोग रमाबाई को मातोश्री अथवा आइसाहेब तथा बी.आर.आंबेडकर को बाबा साहेब कहते थे ।
माताश्री रमाबाई आंबेडकर के माता पिता की मृत्यु बचपन मे ही हो गयी थी । बाद उनके ससुर की तथा फिर उनके चार बच्चों की मृत्यु हो गयी । ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने बाबा साहेब बी.आर.आंबेडकर का साथ दिया ताकि वे अपने समाज को उच्च जातियों की गुलामी से मुक्ति दिलाने के अपने लक्ष्य को पूरा कर सके । बाबा साहेब उन्हे प्यार से रामो कहकर बुलाते थे तथा रमाबाई उन्हे साहेब कहती थी।
बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक ‘थॉट ऑन पाकिस्तान ’ को रमाबाई को समर्पित करते हुए उसमे लिखा है कि एक साधारण भीमा से डॉ. बी.आर.आंबेडकर बनाने का श्रेय उन्हे ही जाता है।
जीवन परिचय
आरम्भिक जीवन परिचय
रमाबाई का जन्म 7 फरवरी 1898 में एक गरीब परिवार में हुआ था। इनके पिता का नाम भिकु धुत्रे व माता का नाम रुक्मणि था। इनका परिवार दाभोल के पास वंणदगाँव में नदी किनारे महारपुरा बस्ती में रहता था। इनकी दो बहनें व एक भाई था। बडी बहन दाभोली में रहती थी। इनकी छोटी बहन की नाम गौरी व छोटे भाई का नाम शंकर था। इनके पिता भिकु धुत्रे दाभोल के पास मछलियों से भरी हुई टोकरियां बाजार में पहुँचाते थे। उनकी छाती में दर्द रहता था।
बचपन में ही रमाबाई ने अपनी माता को बीमारी से जूझते हुए देखा। बीमारी से लड़ते लड़ते उनकी माता की मृत्यु हो गयी। इस मृत्यु ने इनके ह्रदय को बहुत आघात पहुंचाया। इसके कुछ दिनों के बाद इनके पिता की भी मृत्यु हो गयी। माता पिता की मृत्यु के बाद रमाबाई अकेली पड़ गयी। इनके चाचा वलंगकर व मामा गोविंदकर तीनों भाई बहनों को बम्बई ले आये जहाँ ये सब भायावला में रहने लगे।
माता रमाबाई अंबेडकर की शादी
सुबेदार राम जी सकपाल अपने पुत्र भीमा की शादी के लिए लड़की खोज रहे थे। वें रमाबाई को देखने गये तथा देखते ही उन्होंने रमाबाई को भीमा के लिए पसंद कर लिया। अप्रैल 1906 में 9 वर्ष की आयु मे रमाबाई की भीमा के साथ बायकुला मार्केट में शादी हो गयी। शादी के समय भीमा की आयु 14 वर्ष थी तथा वे कक्षा 5 मे पढ़ रहे थे।
शादी के बाद का जीवन
रमाबाई अपनी ससुराल मे खुशीपूर्वक रहने लगी । इनकी यह खुशी अधिक समय तक नही रह पायी । इनके जीवन में नई-नई मुसीबतें और चुनौतियाँ आने लगी । जल्दी ही इनके ससुर की मृत्यु हो गयी। 1913 में भीमराव आंबेडकर को अमेरिका के न्यूयार्क शहर में स्थित कोलम्बिया विश्वविद्यालय से स्नातक करने के लिये बड़ौदा के सयाजीराव गायकवाड द्वारा स्थापित छात्रवृति प्राप्त हुई और वे अमेरिका चले गये।
अक्टूबर 1916 ई. में अमेरिका में अपनी पढ़ाई समाप्त करके वे इंगलैंड चले गये और वहाँ लंदन कॉलेज ऑफ इकॉनोमिक्स में प्रवेश ले लिया। लंदन में ही उनका तीन वर्ष का छात्रवृति का कार्यकाल समाप्त हो गया और उन्हे अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़कर वापस भारत आना पड़ा। 1921 में वे फिर से लंदन चले गए ।
माता रमाबाई अंबेडकर की मृत्यु
रमाबाई की तबीयत खराब रहती थी। बाबासाहेब उन्हें इलाज के लिए धारवाड़ भी लेकर गए लेकिन इनकी तबीयत मैं कुछ भी सुधार नहीं आया। बाबा साहेब की बढ़ती कीर्ति और राजगृह की भव्यता भी इनकी तबीयत में सुधार नहीं कर पाई। अंततः 27 मई 1935 को इनकी मृत्यु हो गई। चार चार बच्चों की मौत और इसके बाद उनकी पत्नी की मौत, इससे बाबासाहेब बुरी तरह टूट गए रमाबाई की मृत्यु पर वह बच्चों की तरह फूट फूट रोए।10,000 लोगों ने माता रमाबाई (Mata Ramabai) के परिनिर्वाण में भाग लिया।
पत्नी की मृत्यु से बाबासाहेब इस कदर टूट गए कि उन्होंने मुंडन करवा लिया और भगवा वस्त्रों को धारण कर लिया। उन्होंने अपने आप को एक कमरे में बंद कर लिया और खाना पीना भी छोड़ दिया। 10 दिनों तक वह शोक में डूबे रहे। बाद में लोगों ने उनको आ करके समझाया कि हमको अभी समाज के लिए बहुत काम करना है। हमारा समाज हमारा इन्तजार कर रहा है।
माता रमाबाई अंबेडकर का त्याग
बाबासाहेब के विदेश में जाकर पढ़ाई करने के दौरान रमाबाई को बहुत ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । इसी समय अंतराल में इनके 4 बच्चों की मृत्यु हो गई । भीमराव अंबेडकर के अमेरिका में रहने के दौरान रमाबाई ने कष्टों भरा जीवन व्उन्हें आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ा था जिनकी तनिक भी भनक बाबासाहेब को नहीं लगने दी।
दूसरी बार बाबासाहेब जब पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने वाले थे। उन्होंने रमाबाई को घर परिवार चलाने के लिए कुछ रुपए दिए थे लेकिन रकम इतनी कम थी कि वह जल्दी खत्म हो गई। तब आर्थिक अभाव के कारण रमाबाई उपले बनाकर बेचा करती थी तथा दूसरों के घर में जाकर भी काम करती थी और सीमित खर्च में घर चलाती थी।
इन्हें कभी धना भाव की चिंता नहीं हुई मातोश्री रमाबाई को 5 संताने हुई लेकिन धनाभाव के कारण इन्होंने 4 बच्चों को अपने सामने दम तोड़ते हुए देखा । इनके पुत्र गंगाधर की ढाई साल की उम्र में ही मृत्यु हो गई । इसके बाद रमेश नाम के पुत्र की मृत्यु हुई । इंदु नाम की बेटी भी कुपोषण का शिकार हुई । इसके बाद सबसे छोटा पुत्र राज रतन भी नहीं बच सका। इनका एकमात्र पुत्र यशवंतराव ही जीवित बचा।
बेटे गंगाधर की मृत्यु के बाद उसके मृत शरीर को ढकने के लिए कपड़ा ही नहीं था, तब रमाबाई ने अपने साड़ी से एक टुकड़े को फाड़ कर शव को ओढाया और उसे श्मशान में ले जाकर दफना दिया गया।
धार्मिक प्रवृत्ति
रमाबाई की महाराष्ट्र के पंढरपुर में विट्ठल रुक्मणी के मंदिर में जाने की इच्छा थी। इन्होंने इस मंदिर में जाने के लिए बाबासाहेब से प्रार्थना की। लेकिन बाबासाहेब ने उन्हें समझाया कि वहां पर दलितों का जाना मना है। अगर हम वहां पर जाएंगे तो हम को मंदिर में घुसने नहीं दिया जाएगा। इसके बाद मातोश्री रमाबाई ने बाबासाहेब से प्रार्थना की कि हम मंदिर को बाहर से ही देख कर के आ जाएंगे।
बाबासाहेब मातोश्री रमाबाई को पंढरपुर के मंदिर में लेकर के गए लेकिन उनको वहां पर मंदिर में नहीं जाने दिया। तब घर आकर के बाबासाहेब ने Mata Ramabai को समझाया कि हम पंढरपुर में ही एक ऐसा बौद्धिक मंदिर बनाएंगे जिसमें किसी के भी जाने की मनाही नहीं होगी । उसमें कोई मूर्ति नहीं होगी। पंढरपुर में विट्ठल रुक्मणी जैसे मंदिर से हमारे समाज का कभी भी उद्धार नहीं हो सकता।
मातोश्री रमाबाई एक त्याग की मूर्ति थी। कठिन परिस्थितियों में भी वह कभी घबराई नहीं। धनाभाव से जूझते हुए तथा अपने बच्चों को कुपोषण से मरते हुए देख कर भी वह बाबा साहेब का साथ देती रहे। बाबा साहेब विदेश में जाकर के पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने सोचा कि जब मेरे साहेब विदेश में जाकर के मेहनत करके पढ़ाई कर रहे हैं तो मैं भी मेहनत करके कुछ पैसे कमाऊंगी और पैसे बचा कर के बाबा साहेब को भेजूंगी। इसीलिए उन्होंने उपले बना करके बेचना शुरू किया । इन्होने दूसरों के घर में भी काम करना शुरू किया। इसलिए मातोश्री रमाबाई को शत-शत नमन।
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