यह कहानी एक बुद्धिमान बालक की है जो अपनी बुद्धिमत्ता के द्वारा अपने बूढ़े तथा बीमार दादा की रक्षा करता है। उसके दादा कैसे खेत में काम करके अपने परिवार का भरण पोषण करता है और अपने बेटे को अपने प्राणों से ज्यादा प्यार करता है। वहा बेटा जब बड़ा हो जाता है तो कैसे बूढ़े तथा बीमार पिता को जिन्दा दफन करने की कोशिश करता है और कैसे वह बुद्धिमान बालक अपने दादा की रक्षा करता है।
बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव मे भोलुराम नाम का किसान रहता था। वह बहुत परिश्रमी, ईमानदार और विनम्र स्वभाव का था। उसका व्यवसाय कृषि था। उसका एक छोटा खेत था। पूरा दिन वह उस खेत मे काम करता था। शाम को घर आता था और अपने परिवारजनों के साथ खुशी से रहता था।
उसकी पत्नि का नाम सुमन था। वह एक नेक विचारों वाली तथा विनम्र स्वभाव वाली महिला थी। वह दिन-भर घर का काम करती रहती थी। घर मे सबके लिए खाना बनाना और पशुओ की देख-रेख करना उसका काम था। वह अपने पति के काम मे भी मदद करती थी। दोनों पति-पत्नि प्रसन्नतापूर्वक अपना समय व्यतीत कर रहे थे।
उनका एक लड़का था जिसका नाम चंचल था। दोनों ही पति-पत्नि उसे बहुत प्यार करते थे। वे उसे किसी भी चीज का अभाव नही होने देते थे। चंचल भी खुश रहता था और अपने दोस्तों के साथ खुब मौज-मस्ती करता और खेलता था। धीरे-धीरे वह किशोरावस्था में पहुँच गया। भोलुराम की पत्नि ने अपने पति को कहा कि अब हमारा बच्चा बड़ा हो गया है। उसे भी अपने साथ काम पर ले जाओ। इससे उसे भी सीखने का मौका मिलेगा और आपको भी सहारा मिलेगा। वह अपना जिम्मेदारी भी समझ जायेगा। किन्तु भोलुराम अपने लड़के को बहुत प्यार करता था। वह उसे कुछ भी काम नही बताता था। अत: वह धीरे से मुस्कुराया और बोला कि अभी वह बच्चा है। समय आने पर अपनी जिम्मेदारी को खुद समझ जायेगा।
भोलुराम की पत्नि अपने बेटे के भविष्य को लेकर अब चिन्तित रहने लगी। वह अपने पति को कहती थी कि जमाना बहुत खराब है और बेटे की आयु बहुत नाजुक है। उसको बिगड़ने में समय नही लगेगा। अच्छा रहेगा यदि हम उसको काम में लगा दे। किन्तु भोलुराम अभी चंचल की आजादी को छीनना नही चाहते थे। अत: वह अपनी पत्नि के आग्रह की अवहेलना कर देते थे।
समय बीतता गया और चंचल जवान हो गया। सुमन को चंचल को लेकर अभी और भी चिन्ता होने लगी। वह सोचने लगी कि बेटा जवान हो गया है कुछ भी काम नही करता। दिन-भर दोस्तों के साथ इधर-उधर घुमता रहता है। उसने भोलुराम से आग्रह किया कि चंचल अब बड़ा हो गया, अभी तो उसको काम में लगाओ। ऐसा करने से आपको भी सहारा मिलेगा। चंचल भी अपनी जिम्मेदारी समझेगा। भोलुराम ने पहले की तरह पत्नि के आग्रह को हँसकर टाल दिया। इस तरह से पति-पत्नि के बीच चंचल को लेकर नोक-झोक चलती रहती थी।
चुँकि चंचल जवान हो गया था। इसलिए उसकी शादी एक सुन्दर लड़की के साथ कर दी जाती है। भोलुराम अब भी उससे कुछ काम नही करवाता। पत्नि के कहने पर कह देता कि समय आने पर खुद अपनी जिम्मेदारी समझ जायेगा। पत्नि सुमन पति के जवाब से गुस्सा हो जाती है और कहती है कि मैं इसकी माँ हूँ दुश्मन नही। मैं इसके भले के लिए ही तो कह रही है। यह कामचोर और निठुल्ला होता जा रहा जा रहा है। इसकी शादी हो गयी है, फिर भी यह घर की जिम्मेदारी को नही समझ रहा है। आप खुद कमजोर और बूढ़े हो गये है, कब तक इसको कमा कर दोगे।
कुछ समय बाद चंचल की पत्नि ने एक सुन्दर बच्चे को जन्म दिया। भोलराम और इनकी पत्नि की खुशी का ठिकाना नही रहा। इस बच्चे का नाम तुषार रखा गया। तुषार के आने के बाद घर में खुशी का माहौल और बढ़ गया। भोलुराम अपने पोते से बहुत प्यार करता था। खेत पर काम करके जब शाम को वह घर पर वापस आता था तो बाकी का समय अपने पोते के साथ के साथ बिताता था। इस तरह से दादा-पोते का समय अच्छी तरह से बीतने लगा। चंचल भी अपनी जिम्मेदारी समझकर अब घर तथा खेत के काम में लग गया था।
सब कुछ ठीक चल रहा था। इसी बीच भोलुराम की पत्नि की तबियत खराब हो गयी। दवा-पानी करने से भी उसकी तबियत ठीक नही हुई। उसकी तबियत बिगड़ती चली गयी। एक दिन वह मौत के मुँह में समा गयी। पत्नि की मौत का भोलुराम के ऊपर बुरा प्रभाव पड़ा। वह अन्दर से टूट गया। वह अकेला पड़ गया।
उसका पोता अब उसके जीवन का आधार बना। तुषार भोलुराम के जीवन व्यतीत करने का एक खिलौना बन गया। वह अपने पोते को जी जान से ज्यादा प्यार करता था। तुषार भी अपने दादा के साथ खेलता तथा उनका मनोरंजन करता रहता था। इस तरह से दोनों के बीच एक असीम प्रेम बन गया था। जब भोलुराम अपने पोते के साथ होता तो अपनी पत्नि की मौत का गम भूल जाता।
धीरे-धीरे समय बीतता चला गया। अब भोलुराम बुढ़ा हो गया। बुढ़ापे के साथ बीमारी ने भी उसको पकड़ लिया। तुषार भी अब आठ साल का हो गया। तुषार सुन्दर होने के साथ-साथ एक बुद्धिमान बालक भी था। वह अपना आयु की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान था। तुषार के साथ भोलूराम का समय खुशीपूर्वक बीत रहा था। घर में हमेशा खुशी का माहौल रहता था।
समय के साथ भोलुराम बहुत बूढ़ा हो गया और उनकी बीमारी भी बहुत बढ़ गयी। उसको दमा हो गया। वह दिनभर खाँसता रहने लगा। भयानक और गंभीर बीमारी ने उसका बुरा हाल कर दिया।
चंचल और उसकी पत्नि अब उसको बोझ समझने लगे। पहले उसका बिछावन घर के बाहर एक छोटे से कमरे में कर दिया। फिर दवा-पानी भी कम दी। चंचल और उसकी पत्नि ने एक दिन भोलुराम को ठिकाने लगाने की योजना तैयार की।
योजना के अनुसार अगले दिन शाम के समय चंचल ने एपने बुढ़े पिता भोलुराम को बैलगाडी पर लेटाकर कहा कि पिताजी को शहर में इलाज के लिए ले जा रहा हूँ। बैलगाडी के पास ही उसका बेटा तुषार खड़ा था। वह भी दादा जी के साथ चलने की जिद करने लगा। उसको बहुत मना करने के बाद भी वह बैलगाडी पर जाकर बैठ गया और दादा जी की छाती से लिपट गया। आखिरकार उसको भी साथ लेकर चलना पड़ा।
जब बैलगाडी गाँव से बाहर निकलकर एक कब्रस्थान के पास आयी तो इसे रोक दिया गया। इस समय अंधेरा और चारो तरफ सन्नाटा हो गया था। चंचल बैलगाडी से नीचे उतरा और तुषार को कहा, ” तुम यही दादाजी के पास बैलगाडी के ऊपर बैठो, मै अभी थोड़ी देर में आ रहा हूँ”। यह कहकर वह बैलगाडी से कुदार लेकर कब्रस्थान की ओर चल दिया। कब्रस्थान में पहुँचकर वह इसके एक कोने में कब्र खोदने लगा।
पिताजी के बहुत देर से नही आने के कारण वह चिन्तित हो गया। थोड़ा और इंतजार करने के बाद वह गाडी से उतरकर कब्रस्थान की ओर चलने लगा। कब्रस्थान में पहुँचकर उसने देखा कि उसके पिताजी इसके एक कोने में जमीन खोद रहे है। यह देखकर वह बहुत आश्चर्यचकित हुआ। उसने चंचल से पूछा पिताजी यह क्या कर रहे हो। चंचल ने कुछ उत्तर नही दिया। तुषार द्वारा अपना प्रश्न कई बार दोहराने पर चंचल को उत्तर देना पड़ा। उसने कहा , “मै कब्र खोद रहा हूँ”। “पर पिताजी किसके लिए?”तुषार ने प्रश्न पूछा। चंचल ने उत्तर दिया, “तुम्हारे दादा जी के लिए”। “लेकिन वे तो अभी जिन्दा है”, तुषार ने पूछा। चंचल ने उत्तर दिया, “देखते नही वे कितने बीमार है, रात-दिन खाँसते रहते है और अब वे हमारे किसा काम के भी नही।”
तुषार ने कुछ देर तक सोचा और फिर अपने पिताजी को बोला, पिताजी, “कुछ समय के लिए कुदाल मुझे दे दो”। कुदाल लेकर वह कब्रस्थान के दुसरे कोने में पहुँच गया और गड्डा खोदने लगा। चंचल भी उसके पीछे-पीछे पहुँच गया और उसको देखकर आश्चर्यचकित हुआ। उसने तुषार से पूछा, “यह क्या कर रहे हो?” तुषार ने उत्तर दिया, “कब्र खोद रहा हूँ”। “पर किसके लिए” चंचल ने पूछा? “तुम्हारे लिए, पिताजी, और किसके लिए”। “पर क्यो, अभी तो मै जिन्दा हूँ”। पिताजी आप बूढ़े होंगे और बीमार भी होंगे। उस समय आपको ज्यादा इंजतार न करना पड़े, इसलिए मै यह कब्र खोद रहा हूँ ताकि जल्दी से आपको दफना सकू।
यह सुनकर चंचल हक्के-बक्के रहे गया और उन्हे अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने तुषार को गोद में उठा लिया। फिर वह तुषार को लेकर बैलगाडी के पास आ गया और अपने पिताजी के पैर पकड़ लिये और उनसे माफी माँगी। भोलुराम भी अपने पोते की बुद्धिमत्ता जानकर खुशीवत रोने लगे।
इस प्रकार तुषार की बुद्धिमत्ता के कारण भोलुराम की जान बच गयी और चंचल भी एक बड़ी भूल करने से बच गये।
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